गांव और शहर

गांव और शहर से नाता बचपन से रहा, पत्रकारिता के वटवृक्ष के नीचे और पत्रकारिता के मोहल्ले में गुजरा बचपन। स्कूल आते-जाते अपनों से ज्यादा लोगो के बारे में सोचने की आदत, कुछ इसी तरह की सोच के कारण कदम पत्रकारिता की तरफ बढ़ते गए। पैसे वालो के यहां जिस तरह से जन्म लेने वालो के बारे में कहा जाता है कि वो चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए है, ठीक उसी तरह से मैं भी पत्रकारिता का चम्मच लेकर मानो अवतरित हुआ हूं। चाचा और पड़ोसियों के पत्रकार होने के कारण 17 साल 4 महीने की उस उम्र मे कागज-कलम लेकर निकल पड़ा। बस फिर क्या था, खबर लिखने का ढंग सिखने लगा। सिखने का दौर आज भी ख़त्म नहीं हुआ है लेकिन मैंने अब एक-एक सीढ़ी चढ़ने की बजाय दो-तीन सीढ़ीया एक साथ चढ़ना शुरू कर दी।

बस फिर क्या था, कब सुबह होती थी, कब शाम और कब आधी रात। रोज शहर के हर कोने पर मोपेड से पहुंचते-पहुंचते यहां तक आ गया। एक समय था जब जितना पैसा वेतन में मिलता था वो सब पेट्रोल में ही खर्च हो जाता था। लेकिन शोहरत कमाने का जिसको जुनून एक बार लग जाए तो फिर वो पैसे की चिंता नहीं पालता। कई बार ऐसा होता था कि सुबह का खाना रात को ही होता था, नाश्ते से काम चल जाता था, शहर में अलग-अलग जगह मित्रों के यहां, परिचितों के यहां जब जो खाने को मिल जता था वो खा लिया करते थे। रात होते ही राजवाड़ा की याद आती थी और वहां पर अन्ना भैया होते थे, जिनके यहां पान खाने के अलावा नाश्ते का भी इंतजाम हो जाया करता था।

बस ये सिलसिला कुछ इस तरह से चला कि पीछे देखकर मुड़ने की जरुरत नहीं पड़ी। लेकिन कई बार ऐसे मौके भी आए जब लगा कि ये कठिन डगर है और मुश्किल से हम इस रास्ते को पूरा कर पाएंगे। लेकिन ये सोच ख़त्म होते ही फिर एक नई सोच जन्म लेती थी और वो ये थी कि पत्रकारिता एक ऐसा जरिया है जिसके जरिए आप समाज की सेवा भी कर सकते है। लोगो की बातें सुनकर कई बार पीड़ा होती थी। पत्रकार वार्ताएं अटेंड करने के दौरान राजनेताओं के जलवे और दहेज़ के कारण  मारी जाने वाली महिलाओं की खबरे लिखते-लिखते हम रुवासे हो जाते थे। जब दंगो का दौर चला और इंदौर में जिस तरह के दंगे हुए उनको नजदीक से देखा। एक बार तो दंगो के दौरान बंबई बाजार का वो किस्सा मुझे याद है जब हम वहां रिपोर्टिंग करने पहुंचे तो दोनों तरफ से गोलियां चल रही थी। एक बार लगा कि कही ऐसा ना हो कि हमारा दिन भी आखिरी हो। कभी कदम पीछे करते तो कभी आगे। जैसे-तैसे करके दंगो की रिपोटिंग की और अयोध्या कांड के दौरान सुबह से लेकर रात तक अख़बार का काम किया। ये सब करते-करते अब हर तरह से माहौल में काम करने की आदत पड़ चुकी थी। एक बार ऐसा हुआ कि कर्बला मैदान पर बड़े जलसे के दौरान दो वर्गो के बीच विवाद की संभावना बढ़ी। रात का कोई समय 10:30 बजे के आसपास का होगा, अफसरों को भीड़ में  जाते हुए देखा, तो मैं भी पीछे जाने लगा, कुछ और भी लोग जाने लगे। कर्बला मैदान के जब बीचोबीच हम पहुंचे तो ऐसा दृश्य दिखाई दिया कि  यहां से निकलना मुश्किल होगा।

रिपोर्टिंग

फिर दूसरी बार जीवन में ऐसा मौका आया जब मौत ने डराया। लेकिन ये सोचा कि अब जो होना होगा वो होगा, काम तो करना ही है। पत्रकारिता में न केवल इंदौर बल्कि इंदौर-उज्जैन संभाग से चार कदम आगे भोपाल और कभी दिल्ली जाकर भी रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। मैंने पत्रकारिता के इन सालों में जो भी देखा, जो सुना उससे मुझे यही लगा कि समाज के उन लोगो की मदद हमेशा करना चाहिए जिन्हें जरुरत है। दिखावा करने की बजाय हमें वास्तविक लोगो की मदद करना चाहिए। जब हम राजनेता और अफसरों के यहां पड़ने वाले छापों की रिपोर्टिंग करते है, तो बड़ी पीड़ा होती है कि लाखों-करोड़ो रूपये उनके यहां से नगद मिलते है। दूसरी तरफ सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाने वाले लोग इलाज के अभाव में मर जाते है। ऐसे हालात लगातार देखने को मिले। नगर निगम चुनाव, विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव की कई बार रिपोटिंग की। जिस तरह का नजारा हमने देखा चुनाव के पहले चुनाव के दिन तो लगा कि देश के हालात ठीक नहीं है।

कोशिश की जब-जब समय मिला कि राजनेताओं और अफसरों को ख़बरों के जरिए सही दिशा देने का काम करे। कई बार व्यक्तिगत चर्चाओं में भी कई नातों और अफसरों को कुछ ठीक काम करने का सलाह-मशविरा भी किया। आज यहां जब हम इस वेबसाइट की शुरुआत करने बैठे है तो लग रहा है कि जीवन का एक हिस्सा पूरा हो चूका है। बाकी हिस्से को भो बेहतर तरीके से पूरा करने के लिए और उसके साथ-साथ एक नई पत्रकारिता की शुरुआत करते हुए प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से वेबसाइट की दुनिया में जाने का मन बनाया।

इस वेबसाइट में कुछ बाते तय होगी और कुछ बाते अचानक मौके आने पर लिखी जाएगी। हमारी इस वेबसाइट में सबसे महत्वपूर्ण कॉलम होगा ‘प्रैक्टिकल फंडा’. जीवन में सब कुछ कर लो लेकिन जब तक आपको प्रतिकल अनुभव नहीं होगा तब तक आपकी डिग्री की कोई अहमियत नहीं है। एक सबसे रोचक कॉलम इसमें ‘माय फ्रेंड’ का होगा। इस देश के युवाओं को सही दिशा में जाने के लिए बहुत सारी सलाह की जरुरत है।

माय फ्रेंड

मैं कोई सलाह देने का काम तो नहीं करूंगा, लेकिन मैं अपने जीवन के अनुभव और युवाओं से लगातार मिलने के दौरान जो फीडबैक मिला उसके आधार पर ‘माय फ्रेंड” कॉलम में हम बताएंगे कि आपको पढ़ाई के दौरान क्या करना चाहिए, बताएंगे कि आपको दोस्त के साथ कैसे रहना चाहिए, हम आपको बताएंगे कि सब्जेक्ट का चयन कैसे करना चाहिए, हम आपको बताएंगे कि करियर का सिलेक्शन कैसे करना चाहिए, हम आपको बताएंगे कि यदि आप ये सब अपने माता-पिता के साथ रहकर कर पाते है तो वो एक बड़ी सफलता होगी। इसी तरह कि कई बातें हम समय-समय पर देते रहेंगे। मैं सोचता हूं कि इस वेबसाइट के जरिए हम बहुत जल्द कुछ बदलाव और खासतौर से वैचारिक बदलाव लाने की कोशिश करेंगे। देशभर के हॉस्टल और विश्वविद्यालय और कॉलेज कैंपस और स्कूल कैंपस के भी रोचक मामले आपको यहां पढ़ने को मिलेंगे।

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